Tuesday, February 15, 2011

इनसां या मशीन?


दौलत, इज़्जत, शोहरत, सब बेकार है,
जो अहम चीज़ है, वो बस किरदार है।

दुख बांटते थे जो लोग, अब कहां हैं,
कंक्रीट का शहर, पत्थर की भरमार है।

सच और उसूल, अब कौन देखता है,
आज कल तो, खबर भी कारोबार है।

कर्ज में गले तक डूबा हुआ है हर घर,
जो मजे में है, वो गांव का साहूकार है।

हर रिश्ता तोलमोल के बनाते हैं लोग,
आज आदमी सयाना है, समझदार है।

खदा जाने, लोग कौन सी जल्दी में है,
यहां तो हर आदमी, घोड़े पर सवार है।

आज मैं फिर मशीन से इनसां कैसे बना,
अरे हां, आज छुट्टी है, आज इतवार है।

कस के चीखो, अब जोर से चिल्लाओ,
इस दौर को इंकलाब की दरकार है।

अरमान

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