Saturday, February 12, 2011

बस नम्बर 331


हवा का झौंका सा चला.. और अचानक ही मेरी पतंग मेरे हाथ से कट चली गई.. मेरी नजर जहां तक जा सकती थी.. मेरी पतंग उससे भी आगे निकल गई थी। मैं सिर्फ देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था.. मेरे हाथ में रह गई थी तो सिर्फ और सिर्फ डोर और वो भी टूटी हुई।
सर्दी का मौसम.. बदन रजाई के अंदर.. किस कम्बख्त का मन बिस्तर से बाहर निकलने का करता..मैं भी उठे होने के बावजूद.. सोने का नाटक करता रहा। पिता जी पूजा कर रहे थे.. घंटी की आवाज के साथ साथ उनकी गालियां भी बीच बीच में मुझे सुनाई दे रही थी। लेकिन अब ये मेरी आदत बन चुकी थी. इसलिए उसे सुना अन सुना करना मुझे आता था। तभी मां आई और कहने लगी.. क्यों इलेश आज कॉलेज नहीं जाना है। मैंने रजाई के अंदर से ही अपना बदन मोड़ते हुए कहा.. नहीं। फिर भी मां ने मुझे जबरन उठा दिया। नहा धोकर मैं नाश्ते के लिए आया..तब तक पिताजी जा चुके थे। मां ने नाश्ता लगाया और उसे खाकर मैं कॉलेज के लिए निकल गया। लक्ष्मीनगर का स्टैंड और वहां से आने वाली डीटीसी की बस 331। मेरे साथ कई और मेरे कॉलेज के लड़के लड़कियां भी बस का इंतजार कर रहे थे। कहते हैं कहीं निगाहें.. कहीं पर निशाना.. कुछ ऐसा ही हाल मेरा भी था.. इंतजार बस का कर रहा था.. लेकिन निगाहें स्टैंड पर खड़ी उन तमाम लड़कियों पर थी...जो खूबसूरत थीं।
अचानक मेरे दोस्त ने मेरे कंधे पर हाथ मारा और मुझे बस के आने का इशारा किया। ये बात गलत नहीं है कि जिसने दिल्ली की बस में चढ़ना सीख लिया.. वो दुनिया की किसी भी गाड़ी में चढ़ सकता है। सुबह सुबह दिल्ली की बसों की हालत बहुत बुरी होती है। आदमी आदमी के ऊपर चढ़ा होता है। सिर्फ पकड़ने और पैर रखने की जगह मिलनी चाहिए.. यात्रा तो अपने आप हो जाती है। बैग को कंधे में डालकर.. मैं भी उस भीड़ के साथ बस में चढ़ने लगा.. पांच मिनट बाद मुझे नहीं मालूम कि मैं खुद बस में चढ़ा था.. या भीड़ ने मुझे चढ़ा दिया। जैसे तैसे मैं बस के अंदर खिसकने लगा। मेरा डीटीसी का पास बना हुआ था.. इसलिए मुझे टिकट खरीदने की टेंशन नहीं थी.. सो मैं आगे बढ़ता गया। बस चलने लगी.. मेरे पीछे से भी कुछ लोग आगे की तरफ आने लगे..मेरा बैग खिंचने लगा.. थोड़ा सा फट भी गया। तभी एक हाथ मेरे हाथ से टकराया... मेरी नजर उसकी तरफ घूमी.. और मानो सबकुछ शांत हो गया। सफेद रंग का शूट.. सफेद रंग की सलवार.. और उस पर गुलाबी रंग की चुन्नी। साफ जाहिर था.. वो किसी इंस्टीट्यूट की स्टूडेंट थी.. रंग गोरा.. ऐसा मानो किसी ने रुई में लाल रंग मिला दिया हो। तीखे नैन.. काले बाल.. आह.. खुदा ने मानो बहुत फुर्रस्त से बनाया। उसने मेरे कंधे पर हाथ मारकर मुझे अपना बैग रखने का इशारा किया। पांच मिनट तक तो मैं चुपचाप उसे देखता रहा.. फिर अपने कंधे से बैग निकालकर मैंने उसे दे दिया। अब हम आईटीओ के पुल पर पहुंच चुके थे। ठंड यहां पर कुछ ज्यादा थी..सभी ठंड से ठिठुर रहे थे लेकिन मेरी ठंड तो मानो काफूर हो चुकी थी। मेरी नजर उसी पर थी.. मैंने एक हाथ से उसी सीट के पीछे से पकड़ा और एक हाथ आगे की सीट पर रखकर उसे कवर कर लिया। यही सोच कर कि कोई मेरी जगह न ले ले। धक्के में धक्के लग रहे थे.. लेकिन मजाल है कि कोई मुझे वहां से हटा दे। वो भी मेरी इस हरकत को देख रही थी.. बीच बीच में उसकी निगाहें उठकर मेरे शक्ल को निहार रही थी..मुझे लगा कि शायद कुछ कहना चाहती थी.. लेकिन भीड़ के कारण वो चुप थी.. तभी पीछे से उसकी कुछ सहेलियां मेरी तरफ आई.. उसकी सहेलियां.. मैं इसलिए कह सकता हूं क्योंकि उन्होंने भी वहीं ड्रेस पहन रखी थी जो उसने पहनरखी थी। वो आई और धक्का मारकर मेरे आगे खड़ी हो गई। मुझे लगा कि अब उसकी आवाज मेरे कानों को छुएगी। लेकिन तभी मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसकी सहेलियां उससे इशारों में बात करने लगीं.. और वो भी जवाब इशारों में देने लगी। वो बोल और सुन नहीं सकती थी.. वो न कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही थी.. वो मैं बोलकर भी चुप चाप खड़ा था। उसको देखता रहा.. और मन ही मन भगवान को कोसने लगा.. कि आखिर क्यों.. आखिर क्यों ऐसा करता है...तभी अम्बेडकर स्टेडियम का बस टर्मिनल आ गया.. और पूरी बस वहां पर खाली हो गई.. तभी कुछ बच्चे आए और वो उनके साथ हो गई.. मेरी निगाहें उसे जहां तक छोड़ सकती थी.. वहां तक मैंने उसे छोड़ दिया।

1 comments:

ब्लैंक पेज said...

ये दिल्ली शहर है बाबू हर वक्त एक नई कहानी बनती रहती है....बस उन कहानियों को पूरा कर एक मुकाम पर ले जाना और अधूरा छोड़ देना हमारे हाथ में होता है

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