Monday, May 2, 2011

बिन लादेन सब सून



प्रिय मित्रों,



सभी को सादर प्रणाम। आपको ये जानकर बहुत दुख होगा कि श्री ओसामा बिन लादेन अब हमारे बीच नहीं रहे। आपकी तरह ख़बर सुनते ही मुझे भी बहुत दुख हुआ। श्री ओसामा एक ऐसे इंसान थे, जो बाप के पैसों पर साउदी में आराम से ऐश की जिंदगी बिता सकते थे... लेकिन नहीं उन्हें ये कतई मंजूर नहीं था। बिन लादेन ने बिना किसी ऐश-ओ-आराम के जिंदगी बिताने का फैसला किया। क्या बुश और क्या ओबामा... लोगों को एकजुट करने की लाख कोशिश करते रहे.... लेकिन ओसामा जिसके प्रवचनों ने अफ़गानिस्तान में तितर-बितर फैले कबिलों को एक कर दिया। अफगानिस्तान में अमेरिका ने क्या दिया.... आसमान से गिरती मौत, लेकिन ओसामा ने उन लोगों को दी आज़ादी... उनको सिखाया, बंदूक चलाना, बम बनाना, एक आम से ख़ास बनना.... ह्यूमन बम बनकर। वो ही एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने गरीब में रहते हुए भी कई शादियां की.... न सिर्फ शादियां की बल्कि कई बच्चे पैदा किए। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा मुल्क़ होगा.... जहां उनकी औलाद न हो। इस मामले में उन्हें हम चंगेजख़ान के बाद रख सकते हैं। इनके बारे में लिखा तो इतना जा सकता है कि खत्म ही ना हो...वो कहते हैं ना...सात समंदर मसि करू...लेखनी सब बनराई...धरती सब कागद करू...ओसामा गुण लिखी ना जाई....



भगवान ऐसे आदमी की आत्म को शांति दे। मेरी बड़ी तमन्ना थी कि ऐसे शख्स के दर्शन करूं... लेकिन ऐसा हो न सका। बेचारे आज हमारे बीच में नहीं रहे। अब तो उनकी तस्वीर के आगे ही अगरबत्ती जलानी पड़ेगी। काश मैं उनके चालीसवें पर जा सकता लेकिन क्या करूं वहीं मिडिल क्लास व्यक्ति की कहानी, नौकरी का डर, परिवार का बोझ। भगवान उनकी आत्म शांति दे।



आपका मित्र

Saturday, April 23, 2011

झुंडपुरा की झंझट

जल्द आ रही है... नई कहानी




'झुंडपुरा की झंझट'

Tuesday, March 15, 2011

सरहद एक दर्द



कबीर-पिताजी क्या हुआ.. श्याम देखो तो, पिताजी को क्या हुआ है। मैं जाकर डॉक्टर को बुलाता हूं।

श्याम- भइया..पिताजी नहीं रहे।

कबीर- क्या

श्याम- भइया देखो पिताजी कुछ लिख रहे थे।

कबीर- पड़ो तो सही.. क्या लिखा है?

श्याम (डायरी पढ़ते हुए...)

आखिर ये कबूतर मेरे घर के हैं या फिर पड़ोस के। मुझे नहीं मालूम.. मुझे तो ये सभी एक जैसे लगते हैं। मेरा तो एक ही काम है.. इन्हें दाना देना और ये दोनों मेरे दिए दाने को चाव से खाते भी हैं। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि ये कबूतर पाकिस्तान से उड़कर हिंदुस्तान आए हैं. अरे तो पागल हैं.. इन्हें क्या पता कि सरहद क्या होती है।

एक बड़ा सा मकान.. मकान के बाहर एक आंगन जिसके बीचो-बीच एक तुलसी का पौधा लगा हुआ था. बाहर से रिक्शे वालों की आवाज से लेकर, चने वाले और लोगों के लड़ने झगड़ने की आवाजे आती थी। सन् 1948 शहर लाहौर

इस मकान में तीन लोग रहते थे। मां-पिताजी और भवानी। भवानी..जो मैं हूं.. या कहूं भवानी..जिसका मुझे नाम मिला.. घर मिला यहां तक की मां-बाप भी मिले। देश भर में आजादी के बाद.. देश को एक साथ जोड़ने और अलग देश की मांग करने वालों में जंग चल रही थी। लोग एक दूसरे को मारने पर उतारू थे। पूरे देश से खून खराबे की खबरें लगातार आ रही थी। लेकिन इन सब बातों से दो घर अंजाम थे।

शाम का वक्त था.. कमरे से एक लड़का निकला..जिसका नाम था.. भवानी। भवानी जोर से चिल्लाया.. मां जावेद भाई ने कहा है कि इस बार दीवाली उनके घर पर मनाई जाएगी। मां बोली..ठीक है भवानी, तो उनसे भी जाकर कह दे कि अगर दीवाली की मिठाई उनके घर से आएगी.. तो ईद की सेवइयां हमारे घर से आएगी। भवानी ने बोला.. ठीक है मां, जैसा तुम कहो। मैं जावेद भाई के घर जा रहा हूं.. और वहां से हम दोनों मेला देखने जाएंगे। ये कहते हुए भवानी घर से निकल पड़ा.. जावेद के घर की तरफ।

जावेद के घर पहुंचते ही.. भवानी ने आवाज लगाई। जावेद...जावेद..अंदर से आवाज आई..कौन.. भवानी। अंदर आ जाओ। बाहर क्यों खड़े हो? भवानी ने कहा.. नहीं रुकने का समय नहीं है। जल्दी से तैयार हो जाओ। नजदीक ही नौटंकी लगी है। देखने चलना है। जावेद कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था.. लेकिन भवानी ने उसे रोक दिया। भवानी ने कहा,,लेकिन वेकिन कुछ नहीं..मैंने कहा चलना है, तो चलना है। भवानी ने घर के चारों तरफ देखते हुए जावेद से पूछा.. अरे अम्मी कहां है। जावेद ने कहा..अम्मी अंदर है। भवानी घर के अंदर दौड़ा..और जोर से अवाज लगाई। अम्मी...मां ने कहा है कि दीवाली की मिठाई आपके घर से आएगी.. तो ईद की सेवइयां हमारे घर से आएगी। अंदर से एक अम्मी की आवाज आई.. ठीक है। सालों से ऐसा ही होता आया है। लेकिन तू इतनी जल्दी में क्यों है और जावेद को लेकर कहां जा रहा है? भवानी ने कहा हम नौटंकी देखने जा रहे हैं। अम्मी ने रोकने की कोशिश की.. लेकिन भवानी ने कहा.. अब सुनने का समय नहीं है... और जावेद का हाथ पकड़कर उसे लेकर चल पड़ा। अम्मी पीछे से आवाज देती रही। लेकिन दोनों तो मानो आजाद पंछी की तरह बस खुले आसमान में उड़ने को बेताब हो।

मेला देखते देखते दोनों को रात काफी हो गई। भवानी ने कहा..यार जावेद.. रात काफी हो गई है..अब तो ख़ैर नहीं। जावेद बोला..मैंने कहा थी न कि हमें देर हो जाएगी। भवानी ने कहा..यार मेरे पर एक तरकीब है..इससे हम दोनों पिटाई से बच जाएंगे। जावेद ने पूछा..तो जल्दी बता क्या करना है। भवानी ने कहा..जावेद ऐसा कर..तू मेरे घर चला जा और मैं तेरे घर चला जाता हूं। दोनों ने ऐसा ही किया। जावेद जैसे ही घर पहुंचा.. तो मां ने पूछा..अरे जावेद तू इतनी रात.. और भवानी कहां है। तो जावेद ने जवाब दिया कि वो उसके घर पर है.. उसे नींद आ रही थी.. इसलिए वो वहीं पर सो गया और यही बताने मैं यहां आया था.. लेकिन अब देर हो गई है तो मैं सोच रहा हूं कि मैं यहीं पर रुक जाऊं। मां ने उसकी तरफ देखा और कहा क्यों नहीं तू भी तो भवानी जैसा ही है..तू है तो मुझे ऐसा ही लगता है कि मानो भवानी मेरे साथ है। ये कहकर मां जावेद के लिए खाना रखने लगी..कुछ देर बाद पिताजी भी आ गए और फिर सभी खाना खाकर सो गए।

जारी है...

Saturday, February 26, 2011

जाने कहां गए जूते


कुछ साल पहले एक एड देखी थी, जिसके बोल कुछ इस तरह थे, देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान कितना बदल गया इंसान। इस एड में मंदिर में कई भक्त आते हैं। कोई खडाऊ पहनकर तो कोई लैदर के जूते पहनकर। लेकिन जब वो मंदिर से बाहर आते हैं, तो उनके जूते चोरी हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही वाकैया मेरे साथ भी हुआ। शनिवार को मैं पटपटगंज स्थित साईं मंदिर गया था। रात के करीब साढ़े नौ बज गए थे। मेरे पास मेरा बैग, एक हेलमेट और मेरे कीमती जूते थे। वो जूते जिन्हें मैंने कुछ एक दो महीने पहले ही खरीदा था। इन सबको मैंने उतारकर मंदिर के बाहर रख दिया। मैंने पूजा की एक थाली ली। फिर मैं पूजा करने के लिए मंदिर के अंदर चला गया। करीब पंद्रह से बीस मिनट बाद मैं मंदिर से बाहर आया, तो देखा कि मेरा बैग और मेरा हेलमेट तो है लेकिन मेरे जूते नहीं है। उन्हें कोई चुराकर ले गया है। मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं हुआ कि वो चोर मेरे जूते ले गया। लेकिन मैं ये सोच रहा था कि आखिर मैं अब घर कैसे जाउंगा। मेरे पैर पर जूते नहीं थे और मुझे बाइक से घर जाना था। मन में कई सवाल आ रहे थे, कि बाइक के गेयर कैसे बदलूंगा। कुछ ऐसा ही वाकैया मेरे दो साथियों के साथ भी हुआ था, एक के साथ दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के पास के साईं मंदिर में तो एक के साथ रोहणी के साईं मंदिर में। लगता है चोरों को साईं मंदिर भाने लगा है। खैर मैं अपने मन को बस यहीं दिलासा दे रहा था कि बेटे तू तो अच्छा रहा, क्योंकि तेरा घर तो नजदीक है। मैंने अपनी जेब में से एक का सिक्का निकाला और बाहर बैठी माई को दे दिया। फिर मैंने अपनी बाइक को किक मारी, लेकिन इसमें मेरे पैर पर लग गई। गेयर बदले और फिर चलने लगा। लेकिन घर पहुंचने से पहले पूरे रास्ते में मैं हर उस शख्स के पैर देख रहा था जिस पर मुझे शक हो रहा था। लेकिन अफसोस मुझे मेरे जूते नहीं मिल सके।

Thursday, February 17, 2011

कमलव्यूह

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में चले 'जय' कार्यक्रम में उत्तराखंड से आए के कलाकारों की कला की कुछ तस्वीरें।

Tuesday, February 15, 2011

इनसां या मशीन?


दौलत, इज़्जत, शोहरत, सब बेकार है,
जो अहम चीज़ है, वो बस किरदार है।

दुख बांटते थे जो लोग, अब कहां हैं,
कंक्रीट का शहर, पत्थर की भरमार है।

सच और उसूल, अब कौन देखता है,
आज कल तो, खबर भी कारोबार है।

कर्ज में गले तक डूबा हुआ है हर घर,
जो मजे में है, वो गांव का साहूकार है।

हर रिश्ता तोलमोल के बनाते हैं लोग,
आज आदमी सयाना है, समझदार है।

खदा जाने, लोग कौन सी जल्दी में है,
यहां तो हर आदमी, घोड़े पर सवार है।

आज मैं फिर मशीन से इनसां कैसे बना,
अरे हां, आज छुट्टी है, आज इतवार है।

कस के चीखो, अब जोर से चिल्लाओ,
इस दौर को इंकलाब की दरकार है।

अरमान

Saturday, February 12, 2011

बस नम्बर 331


हवा का झौंका सा चला.. और अचानक ही मेरी पतंग मेरे हाथ से कट चली गई.. मेरी नजर जहां तक जा सकती थी.. मेरी पतंग उससे भी आगे निकल गई थी। मैं सिर्फ देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था.. मेरे हाथ में रह गई थी तो सिर्फ और सिर्फ डोर और वो भी टूटी हुई।
सर्दी का मौसम.. बदन रजाई के अंदर.. किस कम्बख्त का मन बिस्तर से बाहर निकलने का करता..मैं भी उठे होने के बावजूद.. सोने का नाटक करता रहा। पिता जी पूजा कर रहे थे.. घंटी की आवाज के साथ साथ उनकी गालियां भी बीच बीच में मुझे सुनाई दे रही थी। लेकिन अब ये मेरी आदत बन चुकी थी. इसलिए उसे सुना अन सुना करना मुझे आता था। तभी मां आई और कहने लगी.. क्यों इलेश आज कॉलेज नहीं जाना है। मैंने रजाई के अंदर से ही अपना बदन मोड़ते हुए कहा.. नहीं। फिर भी मां ने मुझे जबरन उठा दिया। नहा धोकर मैं नाश्ते के लिए आया..तब तक पिताजी जा चुके थे। मां ने नाश्ता लगाया और उसे खाकर मैं कॉलेज के लिए निकल गया। लक्ष्मीनगर का स्टैंड और वहां से आने वाली डीटीसी की बस 331। मेरे साथ कई और मेरे कॉलेज के लड़के लड़कियां भी बस का इंतजार कर रहे थे। कहते हैं कहीं निगाहें.. कहीं पर निशाना.. कुछ ऐसा ही हाल मेरा भी था.. इंतजार बस का कर रहा था.. लेकिन निगाहें स्टैंड पर खड़ी उन तमाम लड़कियों पर थी...जो खूबसूरत थीं।
अचानक मेरे दोस्त ने मेरे कंधे पर हाथ मारा और मुझे बस के आने का इशारा किया। ये बात गलत नहीं है कि जिसने दिल्ली की बस में चढ़ना सीख लिया.. वो दुनिया की किसी भी गाड़ी में चढ़ सकता है। सुबह सुबह दिल्ली की बसों की हालत बहुत बुरी होती है। आदमी आदमी के ऊपर चढ़ा होता है। सिर्फ पकड़ने और पैर रखने की जगह मिलनी चाहिए.. यात्रा तो अपने आप हो जाती है। बैग को कंधे में डालकर.. मैं भी उस भीड़ के साथ बस में चढ़ने लगा.. पांच मिनट बाद मुझे नहीं मालूम कि मैं खुद बस में चढ़ा था.. या भीड़ ने मुझे चढ़ा दिया। जैसे तैसे मैं बस के अंदर खिसकने लगा। मेरा डीटीसी का पास बना हुआ था.. इसलिए मुझे टिकट खरीदने की टेंशन नहीं थी.. सो मैं आगे बढ़ता गया। बस चलने लगी.. मेरे पीछे से भी कुछ लोग आगे की तरफ आने लगे..मेरा बैग खिंचने लगा.. थोड़ा सा फट भी गया। तभी एक हाथ मेरे हाथ से टकराया... मेरी नजर उसकी तरफ घूमी.. और मानो सबकुछ शांत हो गया। सफेद रंग का शूट.. सफेद रंग की सलवार.. और उस पर गुलाबी रंग की चुन्नी। साफ जाहिर था.. वो किसी इंस्टीट्यूट की स्टूडेंट थी.. रंग गोरा.. ऐसा मानो किसी ने रुई में लाल रंग मिला दिया हो। तीखे नैन.. काले बाल.. आह.. खुदा ने मानो बहुत फुर्रस्त से बनाया। उसने मेरे कंधे पर हाथ मारकर मुझे अपना बैग रखने का इशारा किया। पांच मिनट तक तो मैं चुपचाप उसे देखता रहा.. फिर अपने कंधे से बैग निकालकर मैंने उसे दे दिया। अब हम आईटीओ के पुल पर पहुंच चुके थे। ठंड यहां पर कुछ ज्यादा थी..सभी ठंड से ठिठुर रहे थे लेकिन मेरी ठंड तो मानो काफूर हो चुकी थी। मेरी नजर उसी पर थी.. मैंने एक हाथ से उसी सीट के पीछे से पकड़ा और एक हाथ आगे की सीट पर रखकर उसे कवर कर लिया। यही सोच कर कि कोई मेरी जगह न ले ले। धक्के में धक्के लग रहे थे.. लेकिन मजाल है कि कोई मुझे वहां से हटा दे। वो भी मेरी इस हरकत को देख रही थी.. बीच बीच में उसकी निगाहें उठकर मेरे शक्ल को निहार रही थी..मुझे लगा कि शायद कुछ कहना चाहती थी.. लेकिन भीड़ के कारण वो चुप थी.. तभी पीछे से उसकी कुछ सहेलियां मेरी तरफ आई.. उसकी सहेलियां.. मैं इसलिए कह सकता हूं क्योंकि उन्होंने भी वहीं ड्रेस पहन रखी थी जो उसने पहनरखी थी। वो आई और धक्का मारकर मेरे आगे खड़ी हो गई। मुझे लगा कि अब उसकी आवाज मेरे कानों को छुएगी। लेकिन तभी मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसकी सहेलियां उससे इशारों में बात करने लगीं.. और वो भी जवाब इशारों में देने लगी। वो बोल और सुन नहीं सकती थी.. वो न कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही थी.. वो मैं बोलकर भी चुप चाप खड़ा था। उसको देखता रहा.. और मन ही मन भगवान को कोसने लगा.. कि आखिर क्यों.. आखिर क्यों ऐसा करता है...तभी अम्बेडकर स्टेडियम का बस टर्मिनल आ गया.. और पूरी बस वहां पर खाली हो गई.. तभी कुछ बच्चे आए और वो उनके साथ हो गई.. मेरी निगाहें उसे जहां तक छोड़ सकती थी.. वहां तक मैंने उसे छोड़ दिया।